अपने हक कि लड़ाई....

Saturday, August 22, 2009 at 2:31 AM

लास्ट कोर्नर की सीट पर बैठी मैं पुरे टाइटेनिक का नज़ारा देख रहीं हूं. अब डूबा की तब डूबा....

(कल जब यह पोस्ट लिख रही थी, उसी वक्त हादसा यह हो गया और पोस्ट अधुरी रह गई,,, आज फिर से बैठी हूं, और आप सें अपना अनूभव बांट रही हूं)

बस... इतना ही लिख पाई... कि टाइटेनिक डूब ही गया... चारों तरफ घुप अंधेरा.. लोगों कि चिल्लाहट.. सबकी सांसे थम गई.. आखिरी बार सब एक दूसरें को देख रहे थें, और सोंच रहे थे, " यह क्या हो गया.."

लड़की हूं, आखिरकार सबसे पहले, महिलावर्ग को बाहर निकाला गया.. हम किनारें पर बैठे मौत का नंगा नांच देख रहें थे.. और हमारे साथी, जुज़ रहे थे.. अपने हक के लिये, हमारे लिये.... सब के सिर पर कफन बंधा था... "आज तो बस आर या पार....."

कई साथी एसे थे जो पहले ही बाहर आ चुके थे, वोह भी अंदर जा कर, डूबतें में साथ देने की कोशिश कर रहे थे, पर उनको अंदर ना जाने दिया गया... पुरा समंदर जैसे की आग कि भट्ठी बन गया, अंदर बैठे बाहर नही आ पा रहे थे, और बाहर बैठे हम, अपने आप को बेबस महसुस कर रहे थे..

टाइटेनिक को चारों तरफ से सुरक्षा जवानों ने घेर लिया.. पता नहिं किसकी सुरक्षा करने आये थे.... साथ में ही चल रहा एक जहाज जिसको आप karpenthiya भी नाम दे सकतें हैं, हमे बचाने के बजाय, हमारी चिता पर रोटियां सेकने आ गया..

हम आंखो में आंसु लीये, आज फिर आये हैं.... उसी जहाज पर,, और कुछ ना सहीं, अपने साथीओं की लडाई में मदद तो कि जाय....

आखिरकार यह हमारी भी लडाई है...

अपने हक कि लड़ाई....

Friday, August 21, 2009 at 6:42 AM
मेरी सांसे रुक रही है. मैं छटपटा रही हूं. पता नही क्युं...
चुपचाप सी बैठी मैं, बस ऐसे ही कुछ कुछ टाइप किए जा रहीं हूं..
लास्ट कोर्नर की सीट पर बैठी मैं पुरे टाइटेनिक का नज़ारा देख रहीं हूं. अब डूबा की तब डूबा... ल

मैं जीत गई...

Thursday, August 20, 2009 at 4:47 AM

ओटो वाला चिल्ला रहा है, आज जल्दी आ गया कम्बख़त. क्या करुं..

जल्दी जल्दी कपड़े प्रेस कीए. अभी तो बाल भी सुखाने है, अरे, चहरे पर मोश्चराईञर भी लगाना रह गया... जल्दी से स्प्रे मारा ओर, आइने के सामने खडी मैं इठलाने लगी..

जैसे ही कुर्ता उठाया, ............

उई मां............. चिख़ निकल गई.. मोटी ताज़ी छिपकली ईठलाती हुई, मेरे सामने प्रकट हुई.. क्या करुं अब मैं ? सारे बदन मे सिरहन सी दौड़ गई... एकबार तो मैं उसकी साफ सी त्वचा को निहारने लगी. कितनी बेदाग थी.. कोनसी क्रिम लगाती होगी ? स्त्री सहज भाव उमड़े... उसकी त्वचा से उसकी उम्र का पता नहीं चल रहा था... हा हा हा..

एकदम से ओटो का होर्न बजा और मैं होश मे आयी. अब क्या करुं.. मरजाणी हिलने का नाम भी तो नहीं ले रही थी.. किसे बुलाउं ?

शायद मुज़े देख कर वोह भी, अचंभीत हो गइ थी. वोह मुज़े देख रही थी, और मैं उसे.. शायद उसे मुजसे प्यार हो गया... हा हा हा....

कोन भगाएगा उसे.? मुज़े देर हो रही थी. और वोह फुटेज खा रही थी. आखिरकार मैंने एक कदम उठाया, वोह जरा हिली. मैं पीछे हटी, वोह आगे बढी.. मैने उसे अनदेखा करनेका नाटक किया,

और जैसे मानो उसे यह बेरुखी बरदास्त ना हुइ और सरसराते हुए भाग निकली.

आह... सांस में सांस आई.... आखिरकार मेरी जीत हुई.....(?)

बाबा सबकुछ ठिक कर देगा.. ओके....

Tuesday, August 18, 2009 at 6:54 AM
बाबा सबकुछ ठिक कर देगा.. ओके....

यह डायलोग आपने सुना होगा. दिल्ही 6 का डायलोग है ये..
जब फिल्म का कलाकार अतुल कुलकर्णि, हर बात पर बोलता है..
मुजे तो खुब भाया था यह डायलोग.. रोज़ बोलते थे सारे मित्र, और हम हसतें थे..
आज भी हम हसतें हैं, जब ओफिस से परेशान होते हैं, यही बोलते हैं... बाबा सबकुछ ठिक कर देगा.. ओके.... काश सबकुछ ठिक हो जाये..

पर यह "बाबा" कोन है ?

ओह, गलत मत सोचियेगा... संत श्रि साइं कि बात नहीं कर रही हुं मैं.. वोह तो देख ही रहे हैं.. शायद ज्यादा से ज्यादा परेशानी दे कर धैर्य कि परिक्षा ले रहें हैं..

अरे भगवान.... अब तो कोई रास्ता दिखा....

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