लास्ट कोर्नर की सीट पर बैठी मैं पुरे टाइटेनिक का नज़ारा देख रहीं हूं. अब डूबा की तब डूबा....
(कल जब यह पोस्ट लिख रही थी, उसी वक्त हादसा यह हो गया और पोस्ट अधुरी रह गई,,, आज फिर से बैठी हूं, और आप सें अपना अनूभव बांट रही हूं)
बस... इतना ही लिख पाई... कि टाइटेनिक डूब ही गया... चारों तरफ घुप अंधेरा.. लोगों कि चिल्लाहट.. सबकी सांसे थम गई.. आखिरी बार सब एक दूसरें को देख रहे थें, और सोंच रहे थे, " यह क्या हो गया.."
लड़की हूं, आखिरकार सबसे पहले, महिलावर्ग को बाहर निकाला गया.. हम किनारें पर बैठे मौत का नंगा नांच देख रहें थे.. और हमारे साथी, जुज़ रहे थे.. अपने हक के लिये, हमारे लिये.... सब के सिर पर कफन बंधा था... "आज तो बस आर या पार....."
कई साथी एसे थे जो पहले ही बाहर आ चुके थे, वोह भी अंदर जा कर, डूबतें में साथ देने की कोशिश कर रहे थे, पर उनको अंदर ना जाने दिया गया... पुरा समंदर जैसे की आग कि भट्ठी बन गया, अंदर बैठे बाहर नही आ पा रहे थे, और बाहर बैठे हम, अपने आप को बेबस महसुस कर रहे थे..
टाइटेनिक को चारों तरफ से सुरक्षा जवानों ने घेर लिया.. पता नहिं किसकी सुरक्षा करने आये थे.... साथ में ही चल रहा एक जहाज जिसको आप karpenthiya भी नाम दे सकतें हैं, हमे बचाने के बजाय, हमारी चिता पर रोटियां सेकने आ गया..
हम आंखो में आंसु लीये, आज फिर आये हैं.... उसी जहाज पर,, और कुछ ना सहीं, अपने साथीओं की लडाई में मदद तो कि जाय....
आखिरकार यह हमारी भी लडाई है...
अपने हक कि लड़ाई....